प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार शरीर में विजातीय द्रव्यों का शरीर के विभिन्न अंगों में संग्रहित होना ही समस्त रोगों के उत्पत्ति का एक मात्र कारण है और विजातीय द्रव्यों के मानव शरीर में संग्रहित होने के प्रमुख कारण हैं अप्राकृतिक जीवन शैली जैसे: सप्राण भोजन से अलगाव और निष्प्राण भोजन से लगाव, पंचतत्वों की अवहेलना, भोग-विलास की अधिकता, कृत्रिम साधनों का अधिकाधिक उपयोग, विकृत मानसिकता इत्यादि। परिणामस्वरूप (i) मानव का शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक स्तर दिन-प्रतिदिन गिरता जा रहा है। (ii) मानव के सभी अंग तंत्र कमजोर एवं निष्क्रिय होते जा रहे हैं, जिसका सबसे बड़ा उदाहरण असामयिक मौतों में वृद्धि है।
According to naturopathy, accumulation of foreign substances in various parts of the body is the only reason for the origin of all diseases and the main reason for accumulation of foreign substances in the human body is unnatural lifestyle such as separation from living food and attachment to lifeless food, disregard for the five elements, excess of indulgence and luxury, excessive use of artificial resources, distorted mentality etc. As a result (i) the physical, mental, intellectual and spiritual level of humans deteriorate day by day. (ii) All the human organ systems are becoming powerless and inactive, the biggest example of which is the increase in premature deaths.
आधुनिक विज्ञान में जब तक अपचय और उपचय में संतुलन है, तब तक मनुष्य पूर्णतः स्वस्थ है। जबकि प्राकृतिक चिकित्सा में भोजन के अंतर्ग्रहण, पाचन और अवशोषण के बाद जो भी विजातीय पदार्थ बनता है उसे पूरी तरह बाहर निकाल देना चाहिए। यही पूर्ण स्वास्थ्य है।
In modern science, as long as there is a balance between catabolism and anabolism, man is completely healthy. Whereas in naturopathy, whatever foreign substance is formed after ingestion, digestion and absorption of food should be completely excreted. This is complete health.
रोग बनने की प्रक्रिया: प्रकृति ने मानव शरीर को इस प्रकार बनाया है कि शरीर के समस्त तंत्र विजातीय द्रव्यों को स्वतः नकालते रहते है जैसे प्रदूषित वायु नासिका और गुदा से, विष्टा गुदा से, डकार मुख से, मूत्र मुतेंद्रिय से, कफ व थुक नाक व मुख से, आँसू आँखों से, पसीना त्वचा से, कर्ण मैल कानों से, नाख़ून के रूप में, बाल के रूप में और महिलाओं में मासिक धर्म के रूप में इत्यादि वशर्ते मानव कोई अनावश्यक बाह्य शक्ति न लगाए।
जब उपरोक्त सभी विजातीय द्रव्य शरीर में संचित होते रहते हैं चाहे कारण शारीरिक निष्क्रियता हो या मानसिक कुवृत्तियाँ, कुछ समय बाद ये विभिन्न रोगों के कारण बनते हैं। सर्वप्रथम विजातीय द्रव्य उदर और पेडू के आस पास संचित होते हैं और क्रमशः पुरे शरीर में फैल जाते है। अर्थात मानव शरीर रोगी हो जाता है।
Process of disease formation: Nature has created the human body in such a way that all the systems of the body keep automatically removing foreign substances as like polluted air from nostrils and anus, excrement from the anus, belching from the mouth, urine from the urinary tract, phlegm and spit from the nose and mouth, tears from the eyes, sweat from the skin, earwax from the ears, in the form of nails, in the form of hair and in the form of menstruation in women, provided the human does not apply any unnecessary external force.
When all the above mentioned foreign substances keep accumulating in the body whether the reason is physical inactivity or mental disorders, after some time these become the causes of various diseases. First of all, foreign matters accumulate around the abdomen and pelvis and gradually spread throughout the body. That means the human body becomes sick.
शरीर में संग्रहित विजातीय द्रव्यों को बाहर निकालने के लिए आयुर्प्रयोगम प्राकृतिक चिकित्सा व योग यौगिक क्रिया षट्कर्म शोधन पद्धति का उपयोग करता है।
Ayurpryogam Naturopathy & Yoga uses Yogic Kriya Shatkarma Shodhana System to remove the foreign matters stored in the body.
———–षट्कर्म———–
(SHATKARMA)
प्राकृतिक चिकित्सा में शरीर में संग्राहित विजातीय द्रव्यों को बाहर निकालकर शरीर के आंतरिक अंगों को शुद्ध करने के लिए 6 यौगिक क्रियाओं का प्रयोग किया जाता है, जिन्हें षट्कर्म कहा जाता है।
In Naturopathy, 6 Yogic Kriyas are used to purify the internal organs of the body by removing the foreign substances accumulated in the body, which are called Shatkarma.
महर्षि घेरण्ड के अनुसार षट्कर्म निम्न हैं —
धौतिर्वस्तिस्तथा नेतिर्लौलिकी त्राटकं तथा । कपालभातिश्चैतानि षट्कर्माणि समाचरेत् ।। (घे०स 1/12)
हठप्रदीपिका के अनुसार षट्कर्म षट्कर्म निम्न हैं —
धौतिर्बस्तिस्तथा नेति: त्राटकं नौलिकं तथा । कपालभातिश्चैतानि षट् कर्माणि प्रचक्षते ।। (ह०प्र० 2/22)
षट्कर्म के अंतर्गत निम्नलिखित 6 यौगिक क्रियाएं हैं (There are the following 6 Yogic processes under Shatkarma):
(i) नेति (Neti) (ii) धौति (Dhauti) (iii) नौलि (Nauli) (iv) वस्ति/ एनिमा (Vasti/Enem) (v) त्राटक(Trataka) (vi) कपालभाति (Kapalbhati)