------श्री मद्भगवत गीता के अनुसार योग------
YOGA ACCORDING TO SHRI MADBHAGWAT GEETA

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गंत्यक्त्वा धनञ्जय | सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वासमत्वं योग उच्यते ||2.48||


अर्थ: धनंजय! तुम्हें आसक्ति का त्याग करके सिद्धि और असिद्धि (लाभ और हानि, शत्रु और मित्र, सर्दी और गर्मी) में समभाव रखते हुए योग के आधार पर अपने कर्म करने चाहिए; क्योंकि समत्व भाव रखना ही योग है।

Dhananjay! You should give up attachment and perform your actions on the basis of Yoga, keeping equanimity between Siddhi and Asiddhi (profit and loss, enemy and friend, cold and heat); because having equanimity is yoga.

बुद्धियुक्तो जहातिहा उभे सुकृतदुष्कृते | तस्माद् योगया युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ||2.50||

अर्थ: बुद्धि से संपन्न व्यक्ति जीवित रहते ही पुण्य और पाप दोनों को त्याग देता है। इसलिए योग में लग जाओ, क्योंकि कर्मों में कुशलता ही योग है।

A person endowed with wisdom gives up both virtue and sin while alive. Therefore, engage yourself in yoga, because yoga is efficiency in actions.

तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्।स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ।।6.23।।

अर्थ: जिसमें दुःखों के संयोग का ही वियोग है, उसी को ‘योग’ नामसे जानना चाहिये। उस ध्यानयोग का अभ्यास न उकताये हुए चित्तसे निश्चयपूर्वक करना चाहिये।

That which involves separation from the combination of sorrows should be known as ‘Yoga’. The practice of that meditation should be done with determination and not with a fatigued mind.

पतंजलि के अनुसार: योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।

अर्थ: चित्त की वृत्तियों का निरोध या मानसिक वृत्तियों का नियंत्रण ही योग है। Yoga is the control of the instinct of the mind or the control of mental tendencies.

योग जीवन जीने का श्रेष्ठ कला है जो व्यवहारिक रूप से शरीर, मन और भावना को संतुलित रखता है और आध्यत्मिक स्तर पर व्यक्तिगत चेतना को सारभौमिक चेतना से जोड़ता है |

Yoga is a great art of living which practically balances body, mind and emotions and connects individual consciousness to universal consciousness on a spiritual level.

आयुर्प्रयोगम प्राकृतिक चिकित्सा व योग का उद्देश्य:

निरोगी मानव को जीवनपर्यंत शारीरिक, बौद्धिक, नैतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से ऊर्जावान बनाये रखना और रोगी मानव के जीवनी शक्ति को बढ़ाकर निरोगी बनाना।

To keep a healthy human being physically, intellectually, morally and spiritually energetic throughout his life and making the sick person healthy by increasing his/her vitality.